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Monday, 27 July 2020

' देहरादून सहस्त्रधारा , छोटे-बड़े चट्टानों को चीरता हुआ जल प्रवाह आँखों के लिए ऐसा था जैसे एक खुबसूरत तस्वीर रखी हो?

' देहरादून सहस्त्रधारा , छोटे-बड़े चट्टानों को चीरता हुआ जल प्रवाह आँखों के लिए ऐसा था जैसे एक खुबसूरत तस्वीर रखी हो? 
अगर लॉकडाउन से पहले आप अपनी ट्रिप की योजनाओं को इस वजह से टाल रहें थे कि आप पैसे नहीं बचा पा रहें थे या आपको ऑफिस से एक या 2 दिन की ही छुट्टी मिलती थी तो देहरादून की ये बजट ट्रिप का प्लान आपके लिए बेस्ट रहेगा।

क्वारंटाइन के दिनों से पहले,  मैं काफी दिनों से सोच रहा था कि ऑफिस से छुट्टी मिले तो कहीं बाहर घूमने जाऊँ पर करियर एक साल पहले ही शुरू करने की वजह से ना तो पैसे बचा पा रहा था ना ही बॉस छुट्टी देने को राज़ी था। ऐसे में मैंने और मेरे तीन दोस्तो ने योजना बनाई कि हफ्ते की अपनी एक छुट्टी का इस्तेमाल करके देहरादून घूमने चलते हैं। बस फिर क्या था, हमने ट्रेन चेक करना शुरू किया। वैसे तो दिल्ली से देहरादून जाने का बेस्ट विकल्प देहरादून जनशताब्दी एक्सप्रेस है जो आपको 5 घंटें में देहरादून पहुँचा देगी और उसका किराया भी कम है पर ट्रेन में सीट ना मिलने की वजह से हमने बस से जाना सही समझा।

दिल्ली से देहरादून बस का सफ़र
हमे दिल्ली ISBT कश्मीरी गेट से बस पकड़नी थी। हमने निर्धारित जगह पहुँचने के बाद हमने खाना खाया और अपनी बस में जाकर बैठ गए। बस थी शुक्रवार रात 10:30 बजे की और ₹1200 में 4 सीट मिल गयी।  हमें दिल्ली से देहरादून के लिए 6 घंटे लगने थे। सुबह जब 5 बजे बस वाले ने हमें जगाया तो हम आई एस बी टी देहरादून पहुँच गये थे। हमने वहाँ के ऑटो वालों से थोड़ी पूछताछ की, ओयो पर हमने पहले ही कमरे चेक किए थे उनका किराया भी ठीक था पर हमें उससे थोड़े सस्ते में ही एक ऑटो वाले ने रूम दिलवा दिया।

सोच समझ कर करें होटल का चयन

ध्यान रहे कि ओयो से रूम लेने पर आपको सुबह और शाम दो दिन का किराया देना पड़ता है क्योंकि ओयो में दोपहर में ही चेक इन की सुविधा है। हम शनिवार सुबह 5 बजे वहाँ पहुँचे थे और हमें उसी रात ही वहाँ निकलना था। हमने होटल वाले से बात की और एक दिन का ही किराया दिया जो हमारे बजट के अन्दर आ गया। हम होटल सुंदर पैलेस में ठहरे थे जहाँ की सुविधाएँ ठीक थी, आस-पास और भी होटल हैं जो आपको उसी किराए पर मिल जाएँगे।

देहरादून 
लोकल बस यात्रा ने संभाला बजट
होटल में कुछ देर सोने के बाद हम 9 बजे तक तैयार हुए। उस समय तक देहरादून की दुकानें खुलनी शुरू हो जाती हैं। हमने आस पास की दुकानों से सहस्त्रधारा जाने तक का रास्ता पूछा। सहस्त्रधारा वहाँ से 1 घंटे की दूरी पर है और आप वहाँ तक की कैब भी कर सकतें हैं। अगर आपको लोकल में सफ़र करने में परेशानी नहीं है तो मेरा सुझाव होगा की अपने पैसे बचाएँ और बस और ऑटो ले लें। कैब में आपको लोकल से 16 गुना ज्यादा खर्च होगा।

घंटा घर
इंदिरा मार्केट के कैफे
हमने अपने होटल के बहार से लोकल ऑटो लिया जिसने हमें करीब 20 मिनट में परेड ग्राउंड उतारा। इसी जगह से हमें सहस्धारा की बस मिलनी थी। इससे पहले हमने नाश्ता करने का फैसला किया। परेड ग्राउंड चौराहे पर एक रास्ता इंदिरा मार्केट की ओर जाता है जिसके आगे देहरादून का प्रसिद्ध घंटा घर है। हम 10 मिनट पैदल चल कर घंटा घर पहुँच गए जहाँ कई कैफ़े थे। घंटा घर सड़क की शुरुआत में ही एक कैफ़े है के बी सी, जिसका अम्बिएंस काफी सुन्दर था, इसलिए हमने वहाँ नाश्ता करने का फैसला किया। यहाँ आपको हर तरह का नाश्ता सस्ते में मिल जायेगा और खाने की क्वालिटी भी अच्छी है। हमने ₹250 में इडली और आलू पराठे की प्लेट मंगवाई थी जो 4 लोगों के लिए काफी था। वहाँ से आधे घंटे में नाश्ता करके हम परेड ग्राउंड की तरफ वापस चले गए।

हमें तुरंत ही सहस्त्रधारा की बस मिल गयी और ₹40 में हमने करीब 1 घंटे की यात्रा की और अपने पहले पड़ाव पर पहुँच गए। बस की यात्रा आधे घंटे के बाद काफी मज़ेदार हो गयी थी। हर तरफ सिर्फ बादल और बादलों के पीछे छिपे पहाड़ दिखाई दे रहे थे।

पहाड़ों से घिरा सहस्त्रधारा
सहस्त्रधारा पहुँचने पर भी नज़ारा कुछ ऐसा ही था, मनमोहक। वहाँ पहुँचते ही आपको कई लोकल ढाबे दिखेंगे और सामने खूबसूरत पहाड़।

हमने पहाड़ की ओर आगे बढ़ना शुरू किया और कुछ देर आगे जाने के बाद हमें एक दुकानदार ने बताया कि सहस्त्रधारा जाने का रास्ता रोपवे से हो कर जाता है। यह सुनकर हम बहुत उत्साहित हो गए। हमने वहाँ से रोपवे की 4 टिकट ली जिसकी कीमत ₹150 प्रति टिकट थी जिसमें आप सहस्त्रधारा के सभी महवपूर्ण आकर्षण का आनंद ले सकते हैं। हम आगे बढ़े और रास्ते में कई पानी के झरने देखे जो मन को बेहद खुश कर देने वाले थे पर हम वहाँ जाना चाहते थे जहां से ये पानी बह कर आ रहा था। हमें दुकानदारों ने रास्ता दिखाया और हम पहुँच गये उस धारा के पास जहां से पानी का बहाव आ रहा था।
छोटे-बड़े चट्टानों को चीरता हुआ जल प्रवाह आँखों और कानों दोनों के लिए ऐसा था जैसे एक खुबसूरत तस्वीर रखी हो और उसमें हम पानी को बहते हुए देख और सुन सकते हैं। वहाँ कुछ देर आराम से बैठ कर हमने उस दृश्य को निहारा, कुछ तस्वीरें ली और रोपवे के लिए आगे बढ़े। आगे कुछ देर चलने के बाद हम रोपवे के लिए अपने डब्बे पर बैठ गए और रोपवे चलने वाले ने मशीन चालू कर दी। हमलोग ऊपर बढ़ने लगे और नीचे का नज़ारा खुबसूरत होता चला गया। रोपवे के उस डिब्बे से आप पूरा सहस्त्रधारा देख सकते हैं और फिर भी आपका मन नहीं भरेगा।
8-10 मिनट की रोपवे यात्रा के बाद हम ऊपर पहुँच चुके थे जहाँ मनुष्य द्वारा बनाए गये कई आकर्षण थे जैसे स्पेस सेंटर, डी जे, बच्चों के लिए टॉय ट्रेन, हमारे लिए शूटिंग, रॉक क्लाइम्बिंग पर हमारे लिए सबसे बेहतरीन आकर्षण था वहाँ के प्राकृतिक नज़ारे। वो जगह इतनी खूबसूरत थी कि हमने वहाँ 100 से ज्यादा तस्वीरें खींची और जितनी ऊपर तक जा सकते थे चढ़ते चले गये।
सहस्त्रधारा में करीब 2-3 घंटे बिताने के बाद हम रोपवे के ही रास्ते से नीचे आ गये। नीचे उतर कर हमने खाना खाने का सोचा पर वहाँ के ढाबों का खाना बेहद महंगा था इसलिए हमने परेड ग्राउंड की बस पकड़ी और वापस घंटा घर वाले के बी सी कैफ़े में जाकर लंच किया।

रॉब्बर्स केव
पानी से भरी गुफा के अन्दर का रोमांच
इसके बाद हमारा अगला पड़ाव था रॉब्बर्स केव या देहरादून की आम भाषा में कहें तो गुच्चुपानी। यहाँ के लिए भी हमें परेड ग्राउंड से बस मिली। वहाँ से गुच्चुपानी के लिए 2 लोगों का किराया ₹24 थे इसलिए हम काफी सस्ते में आधे घंटे के अन्दर रॉब्बर्स केव पहुँच गये। जहाँ बस आपको उतारती है वहाँ से 1 किलोमीटर तक आपको घुमावदार रोड मिलेगी और आपको वहाँ से अन्दर तक पैदल जाना होगा।
 15-20 मिनट चलने के बाद हम गुच्चुपनी के टिकट काउंटर पर पहुँच गये जहाँ से हमने ₹25 प्रति व्यक्ति के हिसाब से टिकट ली। हमनें आगे जाकर एक काउंटर पर अपनी चप्पल जमा की और वहाँ से हवाई चप्पल ली क्यूंकि हमें गुफा के अन्दर बहते पानी में जाना था।
हम आगे गुफा की ओर बढ़े और पानी में उतर गए। पहले तो मुझे थोड़ा डर लग रहा था क्यूंकि कई जगह पर पानी बहुत गहरा था पर गुफा की चट्टानों की मदद से हम आगे बढ़ते गए, गुफा और गहरी होती जा रही थी और पानी मेरी कमर से ऊपर तक आ चुका था।
गुफा के अन्दर जाना थोड़ा मुश्किल है इसलिए अपने साथ सामान ना लेकर जाएँ, और हो सके तो मोबाइल भी जेब में ही रखें। चट्टानों की मदद से और एक दूसरा का सहारा लेकर हम आगे बढ़े और गुफा की अंत में हमें बहुत ही खूबसूरत झरना दिखाई दिया जहाँ से पानी गुफा के अंदर आ रहा था। गुफा के पानी के बहाव से विपरीत जाकर उस झरने तक पहुँचने जितना मुश्किल था उतना रोमांचक भी। वहाँ की कुछ तस्वीरें लेकर हम वापस वहाँ आ गए जहाँ पानी का बहाव कम था।

वो जगह अनोखी थी और मैंने अपने दोस्त के साथ कई तस्वीरें खींची और पानी में खूब मस्ती की। करीब 2 घंटे समय बिताने के बाद और पूरी तरह गीले होने के बाद हम गुफा से बहार आये और जिस रास्ते से आये थे उसी रास्ते लौट गये।

जहाँ बस ने हमें उतारा था वहाँ से हमें लोकल ऑटो मिल गया और हम अपने होटल वापस आ गये। हमें देहरादून के डियर पार्क भी जाना था पर कपड़े गीले होने की वजह से हम होटल वापस आ गये।

वापस आकर हमने थोड़ा आराम किया, फिर बहार जाकर समोसे और मिठाई खायी। कुछ देर वहीं आस पास घूमने के बाद हमें पास के ढाबे में डिनर किया और फिर सामान लेकर बस के लिए निकल पड़े।

देहरादून की आखिरी ट्रीट

वापसी के लिए हमें सुभाष नगर ग्राफ़िक एरा से बस पकड़नी थी जो आई एस बी टी से सीधे रस्ते पर पड़ता है। हमने ऑटो लिया और 20 मिनट में पहुँच गये। जहाँ से बस मिलनी थी वहाँ एक बहुत शानदार पिज़्ज़ा प्लेस नज़र आ रहा था। बस आने में समय था इसलिए हम उस पिज़्ज़ा प्लेस पर गए और वहाँ फ्रूट संडे आर्डर किया। देहरादून की वो हमारी आखिरी ट्रीट थी और वो भी बहुत स्वादिष्ट थी।

देहरादून हम गए एक दिन के लिए थे पर एक दिन में रोपवे पर जाना, पहाड़ पर ऊपर तक जाना, और पानी से भरी गुफा में जाना, ये सब कुछ बहुत मनोरंजक भी था और बजट में भी था। इस पूरी ट्रिप में 4 लोगों का कर्च लगभग ₹11,000 के करीब था जो की एक बजट ट्रिप के लिए बिलकुल परफेक्ट था।


दोस्तों हम आपको भारत 😍 की सबसे खूबसूरत जगहों के बारे में बताते हैं हमारे पेज से जुड़ें ओर अपने मित्रों को भी जोड़ें कुदरत की खूबसूरती को निहारे😍☺️
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Sunday, 26 July 2020

भारत की टॉप 7 जगह जहाँ सुकून के साथ कुछ अडवेंचर भी चाहिए तो फिर क्यों न बंजी जंपिंग ट्राई की जाए?

भारत की टॉप 7 जगह जहाँ सुकून के साथ कुछ अडवेंचर भी चाहिए तो फिर क्यों न बंजी जंपिंग ट्राई की जाए?
लोगों को रोमांच चखने के लिए अलग,अनोखी, नई-नई चीज़ें को करने का शौक़ होता है। पर आमतौर पर तो हम ऑफिस की चारदीवारी के बीच कैद हफ्ते भर कामकाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए अपने आप को तरोताज़ा करने के लिए यह ज़रूरी है कि हम कुछ आउटडोर एक्टिविटी करें जिससे हमारी मानसिक थकावट दूर हो जाए। सारी चिंताओं को भुला देने कि लिए बंजी जंपिंग एडवेंचर का एक बेहतरीन तरीका बन गया है।

भारत में बंजी जंपिंग ने हाल ही में रोमांच के दीवानों के बीच अपनी जगह बनाई है।  इसका कारण है इसकी सुरक्षा में इज़ाफ़ा और इंटरनेट पर लोकप्रियता। मुझे पूरा यकीन है कि अगर आप अपने चारों ओर बँधी हुए रस्सी के साथ एक ऊँचाई से कूदें हैं तो आपके पास जीवन भर के लिए बताने के लिए पहले से ही कई कहानियाँ हैं। और अगर आपने अभी तक यह कोशिश नहीं की है,

 तो गर्मियां शुरू हो गई हैं और उसी के साथ लोगों की घूमने की प्लानिंग भी। चिलचिलाती गर्मी में अगर सुकून मिलता है तो बस हिल स्टेशन पर, लेकिन सुकून के साथ कुछ अडवेंचर भी चाहिए तो फिर क्यों न बंजी जंपिंग ट्राई की जाए? आज हम आपको उन जगहों के बारे में बताएंगे, जहा बंजी जंपिंग होती है और आप भी उसका लुत्फ उठा सकते हैं:

1. जंपिंग हाइट्स ,  ऋषिकेश
जनता के लिए पेशेवर बंजी जंपी करने का मौका देने वाली पहली कंपनियों में से एक, जंपिंग हाइट्स इसके नाम को सही साबित करती है। यह ऋषिकेश के पास मोहनचट्टी में भारत की सबसे ऊँची फिक्स्ड प्लेटफार्म वाला बंजी जंपिंग स्टेशन है । यहाँ बंजी को न्यूजीलैंड के डेविड अलार्डिस द्वारा डिजाइन किया गया है, और पेशेवर जंपिंग मास्टर्स को कूदने में सहायता के लिए रखा गया है।

 स्थान: मोहनचट्टी (ऋषिकेश से 25 कि.मी.)

कीमत: ₹3,500 

ऊँचाई: 83 मीटर


2. ओज़ोन एडवेंचर्स ,  बंगलौर
ऋषिकेश से उलट, बंजी जंपिंग के लिए यहाँ कोई फिक्स्ड प्लेटफार्म नहीं है। पूरा मंच एक 130 फीट ऊँचे मोबाइल क्रेन से जुड़ा हुआ है, जो कूद को थोड़ा और खतरनाक बना देता है। 18 से 60 वर्ष की उम्र के बीच कोई भी व्यक्ति इसे ट्राई कर सकता है।

स्थान: सेंट मार्क रोड, बेंगलुरु

मूल्य: ₹500 

ऊँचाई: 25 मीटर


3. वंडरलस्ट ऑपरेटर्स ,  दिल्ली 
"भारत का एकमात्र आधिकारिक बंजी ऑपरेटर" होने का दावा करते हुए, वेंडरलस्ट ऑपरेटर पूरे बंजी उपकरण किराए पर या बिक्री के लिए देता है। ये 1999 से भारत में बंजी जंपिंग करवा रहे हैं और क्रेन, पुल और टावर जंपिंग में एक्सपर्ट हैं।

स्थान: ग्रेटर कैलाश II, नई दिल्ली

मूल्यः 1500 रुपये

ऊँचाई: 25 मीटर



4. ग्रेविटी एडवेंचर ज़ोन ,  गोआ
भारत में सबसे सुंदर (और तर्कसंगत रूप से सबसे रोमांचकारी) बंगी जंप प्रदान करते हुए, गुरुत्वाकर्षण एडवेंचर जोन गोवा में सिर्फ शराब और नाइटलाइफ़ से ज्यादा लोगों की तलाश में लोगों के लिए एक जगह है। खूबसूरत अंजुना बीच के नजदीक स्थित, यह स्थान आमतौर पर पहली जगह है जहां ज्यादातर लोग भारत में बंजी कूदते हैं। हालांकि बहुत सुरक्षित और पेशेवर, मानसून के दौरान यहां कूदना चाहिए।

स्थान: मार्केट रोड, अंजुना घाटी

 मूल्यः ₹500 

ऊँचाई: 25 मीटर



5. डेला एडवेंचर ,  लोनावला
डेला एडवेंचर का दावा है कि ये "भारत का सबसे बड़ा एक्सट्रीम एडवेंचर पार्क" है, इसलिए अगर आप मुंबई में एक कॉर्पोरेट गुलाम हैं और एक पल के लिए अपनी साँसों की रफ्तार बढ़ाना चाहते हैं तो ऐसा करने के लिए यह बेस्ट जगह है। ये बंजी जंपिंग का एक वैकल्पिक और सुरक्षित ढंग से कराते हैं , जिसे बंजी ट्रैम्पोलीन कहा जाता है। आपने इसे कई मॉल में भी देखा होगा, लेकिन यहाँ पर सिर्फ 18 से ज्यादा उम्र वाले लोग ही हिस्सा ले सकते हैं , क्योंकि यह 28 मीटर ऊँचा है। ये आपको चारों ओर से कस कर एक लम्बी उड़ान पे भेजते हैं।

स्थान: ओल्ड हाईवे, कुनेगांव, लोनावाला

मूल्य: ₹500 रुपये

ऊँचाई: 28 मीटर



6. जगदलपुर ,  छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में जगदलपुर आखिरी जगह है जहाँ आप एक साहसिक खेल में शामिल होने की उम्मीद करेंगे, लेकिन आप यहाँ आने के बाद हैरान हो जाएँगे। बंजी जंपिंग की जगह वास्तव में पहाड़ की चोटी पर है, इसलिए जब आप कूदते हैं तो आपकी आँखों के सामने का नज़ारा आपको हैरान कर देगा। यह एक ऐसा स्थान भी है जहाँ बंजी जंपिंग सबसे सस्ता है, जो शायद आपको इस स्थान पर आने के लिए प्रोत्साहित करेगा। इस पर विश्वास करने के लिए इसका अनुभव करें।

स्थान: जगदलपुर

मूल्य: ₹300 

ऊँचाई: 30 मीटर



7. हिमवैली कैम्प्स ,  मनाली
मनाली की भीड़ वाली मॉल रोड से 5 कि.मी. से भी कम दूरी पर बहंग नामक एक शांत जगह है। सभी सुरक्षा उपायों की पूरी तरह से देखभाल की जाती है लेकिन हिमाचल की घाटियों में फ्री फॉल का यह अनुभव ऐसा है जो पहले ही आपके रोंगटे खड़े कर देगा।

स्थान: बहांग

मूल्य: ₹350 

ऊँचाई: 25 मीटर




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तोष , हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत गाँव जो दिल्ली वालो को अपनी ओर खिचता हैं.

' तोष , हिमाचल प्रदेश का एक खूबसूरत गाँव जो दिल्ली वालो को अपनी ओर खिचता हैं.
लम्बी लम्बी मटमैली सड़कें, जिसके गड्ढों में रात का पड़ा पानी जमकर बर्फ़ बन गया है। दोनों ओर के ऊँचे पहाड़ों पर बर्फ़ मिठाई के चाँदी वाले कवर की तरह चमक रही है। उसके बीच में उगे हुए हैं पेड़, जो दूर से देखो तो चटख रंग के काँटे की तरह लगते हैं। छोटे छोटे घर हैं, जिनकी छत तिरछी टोपी की तरह बनी है, ताकि बर्फ़ ना टिक सके। कहीं भी कैमरा घुमाओ, हर तरफ़ ख़ूबसूरती लबालब भरी हुई है।
हिप्पी संस्कृति वाला तोष कुछ ऐसे ही स्वागत करता है आपका। और ये सारी बातें हवा हो जाती हैं, जब आप ख़ुद इस अनुभव को महसूस कर रहे होते हो। क्योंकि तब एक अनछुई सी ठण्ड आपको घेरे रहती है। चाय की टपरी की कड़क चाय और शानदार लगने लगती है, मैगी की भाप देखकर लालच बढ़ने लगता है, समझ नहीं आता पहले फ़ोटो खींचें या स्वाद चखें। आज मैं आपको उसी तोष के बारे में बताने वाला हूँ।

तोष में क्या- क्या करें
1. तोष में ही घूमने के लिए

तोष ख़ुद में घूमने के लिए बहुत बढ़ियाा एहसास है। हिप्पी संस्कृति से शायद पहली बार रूबरू होंगे आप। इस गाँव की ऊँचाई बहुत ज़्यादा है, इसलिए यहाँ पर मोटरबाइक के हिसाब वाली सड़क नहीं हैं। लेकिन अच्छी बात ये है कि घूमने के लिए आप पैदल ही हर जगह जा सकते हैं। सारी जगहें एक दूसरे के नज़दीक ही हैं।

सेब के बाग और हरे चारागाह, जहाँ चरवाहे अपने मवेशियों को चराने ले जाते हैं, देखने के लिए बहुत ही सुन्दर हैं।

2. पार्टियाँ
तोष मुख्य रूप से घुमक्कड़ों का अड्डा है। बैकपैकर्स आपको यहाँ हमेशा ही मिलेंगे। ऐसी ढेरों पार्टियाँ यहाँ होती रहती हैं।

3. ट्रेकिंग करने निकलें
ट्रेकिंग करने वालों के लिए यह जगह स्वर्ग है। वो इसका नाम कभी अकेले नहीं लेते, इसके साथ कभी खीरगंगा, तो कभी कसोल का नाम भी जुड़ा मिलता है। तोष, खीरगंगा, कसोल, मणिकरण, मलाणा और ढेर सारी भाँग, भोले बाबा की असीम कृपा है यहाँ पर। उनका कोई भी भक्त चाह ले, तो यहाँ से खाली हाथ नहीं जाता।

4. जमदग्नि ऋषि मन्दिर

साल में सिर्फ़ जनवरी फ़रवरी के कुछ दिनों के लिए यह मन्दिर खुलता है। गाँव के बीचों बीच स्थित इस मन्दिर के बरामदे से ऊपर देखो तो हिमालय ऊपर से ताकता हुआ मिलता है। तेज़ चिल्लाओ तो आवाज़ वापस आती है, लगता है पूरा हिमालय इस मन्दिर की रखवाली के लिए बैठा हो। अपने छोटे से तोष में इस मन्दिर में घूमने के लिए ज़रूर समय निकालना।

घूमने का सही समय

बहुत ऊँचाई पर बसा है तोष। समुद्रतल से 7,900 फ़ीट ऊपर। ठण्ड अपनी चरम सीमा पर होती है, तो किसी पर रहम नहीं खाती। वही बच पाता है, जो दिल का पक्का घुमक्कड़ होता है। घूमने का समय पूछो तो अप्रैल से अक्टूबर का समय सबसे बढ़िया रहेगा। अगर पक्के वाले घुमक्कड़ हो, दिल में जज़्बा है और ठण्ड से प्यार, तो पूरा साल आपका ही आपका है।

ठहरने के लिए
जैसे-जैसे करके यह जगह अपना नाम कमा रही है, पर्यटन बढ़ने से गेस्टहाउस और होटल्स भी इस तरफ़ अपने कदम जमा रहे हैं। इसलिए रहने की समस्या नहीं होगी आपको। पिंक फ़्लॉयड, अश्विन कैफ़े और होटल हिलटॉप, कुछ गिने चुने नाम हैं। इसके अलावा भी कुछ होमस्टे हैं, जिनके बारे में आपको देखना चाहिए।

स्वादघर

भारतीय, इटैलियन और यूरोपियन; तीन क़िस्मों का खाना यहाँ ख़ूब खाया जाता है। कई सारे कैफ़े में आपको पिज़्ज़ा और सैंडविच आसानी से मिलेंगे। तोष में आपको हर प्रकार का खाना मिल पाना अभी तो संभव नहीं है। लेकिन जगह इतनी ख़ूबसूरत है कि मैगी और चाय में भी बड़ी स्वाद होती है, जिसने खाया है, सबने गुण गाया है।

तोष कैसे पहुँचें

सड़क मार्गः दिल्ली के आईएसबीटी कश्मीरी गेट से मणिकरण के लिए बस पकड़ लीजिए और वहा से 16 किमी0 का छोटा सा ट्रेक है तोष, वहा से टैक्सी वाले ₹100 में आपको पहुँचा देंगे। तोष पहुंचने के बाद गाँव खोड़ा उचाई पर है तो आपको वहा पैदल ही जाना पड़ेगा! 

रेल मार्गः जोगिन्दर नगर रेलवे स्टेशन सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है, जिसके लिए आपको टॉय ट्रेन कठुआ से मिलेगी।

हवाई मार्गः सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा भुंंतर का है, जहाँ से आपको तोष के लिए टैक्सी आसानी से मिल जाएंगी।




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Saturday, 25 July 2020

उतराखंड के पहाड़ों में छुपी हैं कुदरत की एक और फूलों की घाटी! ' चैनाप घाटी ट्रैक ,

उतराखंड के पहाड़ों में छुपी हैं कुदरत की एक और फूलों की घाटी!  ' चैनाप घाटी ट्रैक ,

जब भी हम पहाड़ों पर खूबसूरती की बात करते हैं तो फूलों की घाटी का जिक्र ज़रूर आता है। बहुत लोग इस जगह को अपना ड्रीम डेस्टिनेशन भी कहते हैं, वजह है यहाँ की सुंदरता। पहाड़ों के बीच एक घाटी है जहाँ चारों तरफ कई प्रकार के फूल दिखाई देते हैं। ये वाकई बहुत सुंदर है। लेकिन इस घाटी के अलावा एक और घाटी है जहाँ फूलों की भरमार है। वो घाटी भी फूलों की घाटी की तरह ही फूलों से गुलज़ार रहती है लेकिन इस जगह के बारे में बहुत कम लोगों को पता है। मुझे भी इस जगह के बारे में नहीं पता था। मैं भी सबकी तरह फूलों की घाटी जा रहा था। जब इस जगह के बारे में पता चला तो पहुँच गया एक और फूलों की घाटी, चेनाप घाटी।
घूमने के लिए वजह नहीं बस सोच होनी चाहिए और मैं तो हमेशा घूमने के बारे में ही सोचता रहता हूँ। एक दिन मुझे मेरे दोस्तो का फोन आया और फूलों की घाटी चलने को कहा। मैं फूलों की घाटी के बारे में सोचकर ही बहुत खुश हो रहा था। लेकिन मुझे क्या पता था कि फूलों की घाटी अभी मेरी घुमक्कड़ लिस्ट से दूर ही रहेगी। हम चारो अपनी कार से अगली सुबह 9 बजे ही दिल्ली से हरिद्वार के लिए निकल गए। अचानक बने प्लान में एक ही कमी होती है, तैयारी। मेरा मोबाइल फुल चार्ज नहीं था और हमे बहुत लंबा रास्ता तय करना था। मैंने मोबाइल कार में चार्ज करने लगा दिया, दिल्ली से जैशीमठ 477 कि.मी  13 से 14 घंटे का रास्ता है! 


हरिद्वार
सफर के बाद सफर

दोपहर 3 बजे हमने हरिद्वार पहुँच कर लंच किया ।
उत्तराखंड आते ही हवा बदल जाती है और ये ठंडी-ठंडी हवा मेरे मन को भी भा रही थी। जल्दी ही हम हरिद्वार और ऋषिकेश को पार करती हुई पहाड़ों के बीच घूमने लगे। पहाड़ों के बीच हर बार एक अलग ही एहसास होता है, मंजिल का एहसास। मंजिल तो अभी बहुत दूर थी, अभी तो सफर शुरू हुआ था। पहाड़ पर कार गोल-गोल घूम रही थी कभी पहाड़ हमारे बगल पर होता तो कभी घाटी। उसी को देखते हुए हम देवप्रयाग पहुँच गए। देवप्रयाग शहर सड़क से बहुत नीचे था लेकिन यहाँ से संगम दिखाई दे रहा था। दो अलग-अलग रंग की नदियाँ अलकनंदा और भागीरथी का संगम हो रहा था। इसी जगह पर दोनों नदियों के मिलने से एक नई नदी बनती है, गंगा।
मैं जब भी देवप्रयाग से गुज़रता हूँ तो एक अफसोस रहता है कि इस शहर को करीब से कब देख पाउँगा। इस बार भी वही अफसोस लेकर आगे बढ़ गया था। जल्दी ही श्रीनगर आ चुका था और उसके बाद रुद्रप्रयाग आता है। ये शहर भी एक पौराणिक स्थल है। यहाँ भी दो नदियों का संगम होता है, अलकनंदा और मंदाकिनी। इसके बाद का सफर तो खूबसूरती से भर जाता है। रास्ते में कई प्रयाग मिलते हैं, कर्ण प्रयाग, नंद प्रयाग और आखिर में पहुँचते हैं चमोली। चमोली उत्तराखंड के सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। आगे का हमारा पूरा सफर चमोली जिले में ही होने वाला था। हम काफी लंबा सफर तय कर चुके थे और शाम भी हो चली थी। फिर भी दिन का आखिरी पड़ाव रह गया था, हम उसी पड़ाव की ओर बढ़ चुके थे। करीब दो घंटे के बाद मैं जोशीमठ आ गया। यहाँ हमे रात भी गुज़ाहरनी थीI

जोशीमठ
फूलों की घाटी या फूल घाटी

हमने रात गुजारने के लिए एक कमरा ले लिया। हम पूरी रात बस यही सोचते रहे कि कहाँ जाए। सुबह-सुबह जब हम नाश्ता कर रहे थे तब हमारी मुलाकात एक घुमक्कड़ से हुई। उसने बताया कि वो चेनाप घाटी जा रहा है, जहाँ पहुँचने में तीन दिन लगते हैं। वो बताकर चला गया और मेरे मन में चेनाप घाटी ही चलने लगी। हम फूलों की घाटी को भूल चुके थे और अब हमारे पास एक नई जगह थी, चेनाप घाटी।
जोशीमठ से चेनाप घाटी की दूरी लगभग 28 कि.मी. है और वहाँ तक जाने के लिए लगभग तीन दिन तक चलना था। हम सभी ने अपने आपको चेनाप के लिए तैयार कर लिया था और उसके लिए आगे भी बढ़ गए। सबसे पहले हमे थैंग गाँव तक जाना था और उसके लिए मारवाड़ी पहुँचना था। मारवाड़ी, जोशीमठ से 10 कि.मी. की दूरी पर है, जहाँ तक हम अपनी कार से आराम से पहुँच गये और कार पार्किंगमे लगा दी थी! अब आगे का रास्ता हमे पैदल ही तय करना था। थैंग गाँव तक पहुँचने का रास्ता बेहद खूबसूरत है और उसी रास्ते पर हम धीरे-धीरे चले जा रहे थे। रास्ते में हम जैसे घुमक्कड़ कम ही लोग थे और यहीं रहने वाले लोग ज्यादा मिल रहे थे। हमने उनसे बार-बार पूछा लेते थे कि हम सही रास्ते पर हैं या नहीं।
हम जब थैंग गाँव पहुँचे तब तक शाम हो चुकी थी। हम सभी के पास खुद का टैंट था, हमने उसको लगाया और आराम करने का इंतज़ाम कर लिया। गाँव में ही एक छोटी-सी दुकान मिली, जहाँ से कुछ सामान लिया और खाना खाया। थैंग गाँव बेहद खूबसूरत गाँव है, पहाड़ों के बीच ये हरा-भरा गाँव देखकर आप ताज़गी से भर जाते हैं। यहाँ की महिलाओं को देखकर यहाँ की संस्कृति का एहसास किया जा सकता है। अगर आप होमस्टे में रूकना चाहते हैं तो वो व्यवस्था भी यहाँ है। हम सभी बहुत थक चुके थे इसलिए लेटते ही नींद आ गई। सुबह उठे तो सामने का नज़ारा देखकर मन खुश हो गया। सामने पहाड़ों पर बादल तैर रहे थे और हरे-भरे पहाड़ सुंदरता का परिचय दे रहे थे।


अगला पड़ाव-खर्क
सुबह जल्दी ही हम खर्क गाँव की ओर निकल गए। इस सफर के लिए हमने काफी पानी साथ में ले लिया क्योंकि हमे गाँव वालों ने बताया था कि रास्ते में पानी नहीं मिलेगा। थैंग गांव से खर्क की दूरी लगभग 6 कि.मी. है। वहाँ तक का रास्ता जंगल से होकर गुजरता है और जंगल में ऐसे कई पेड़ हैं जिनको शायद ही हमने कभी देखा था। खर्क गाँव तक का रास्ता जंगल से होकर ज़रूर गुजरता है लेकिन इतना कठिन नहीं है। हम शाम होने से कुछ घंटे पहले ही यहाँ पहुँच गए। अब हमारे पास दो रास्ते थे या तो रात यहीं गुजारे या शाम होने से पहले चेनाप घाटी पहुँच जाए। हम सभी ने दूसरा रास्ता चुना और बढ़ गए चेनाप घाटी की ओर।
खर्क गाँव से चेनाप घाटी की दूरी लगभग 4 कि.मी. है। दो किमी. की चढ़ाई तो बहुत थका देती है लेकिन उसके बाद सब कुछ आसान हो जाता है। क्योंकि उसके बाद खूबसूरती हमरी थकान को दूर कर रही थी। दो किलोमीटर के बाद ही कई प्रकार के फूल आपको दिखने शुरू हो जाते हैं। हम उसी घाटी में रात गुज़ारने वाले थे, जहाँ लगभग 350 प्रजाति के हिमालयी फूल पाये जाते हैं। इसके बावजूद इस घाटी के बारे में उत्तराखंड के टूरिस्ट मैप में जिक्र तक नहीं है। साल 1987 में औली में पहले नेशनल खेल के शुभारंभ पर इस जगह को टूरिस्ट मैप में जोड़ने की माँग की गई थी। उसके बाद कई बार इसको विकसित और टूरिस्ट मैप में जोड़ने की बात तो की गई लेकिन जोड़ा नहीं गया।

फूलों की क्यारियाँ
चेनाप घाटी का सबसे बड़ा आकर्षण है, यहाँ प्राकृतिक रूप से बनी डेढ़ मील लंबी मेड़ और क्यारियाँ। देव पुष्प ब्रम्हकमल को अगर देखना है तो आपको चेनाप आना चाहिए। ये क्यारियाँ ब्रम्हकमल से भरी हुई हैं। इन क्यारियों को देखकर ऐसा लगता है कि किसी ने इसे करीने से लगाया हो। इन क्यारियों को यहाँ फुलाना कहते हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि यहाँ परी आती हैं और फूलों की खेती करती हैं। फूलों के अलावा यहाँ दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव और जड़ी-बूटियों का भंडार है। हम इन फूलों को देखते-देखते आगे बढ़े जा रहे थे और बेहद खुश हो रहे थे। यहाँ तो मन करता है कि एक जगह बैठा जाये और घंटो इन फूलों और पहाड़ों को निहारा जाए।
चेनाप घाटी के बारे में पुराणों में भी उल्लेख है। कहा जाता है कि जितनी खूशबू चेनाप के बुग्याल के फूलों में है उतनी खूशबू तो गंधमादन पर्वत और बदरीवन के फूलों में भी नहीं पाई जाती। कहा जाता है कि राजा विशाला ने हनुमान चट्टी में विशाल यज्ञ किया था। जिस वजह से बदरीवन और गंधमादन पर्वत के फूलों की खूशबू खत्म हो गई। दो साल पहले चेनाप घाटी को ट्रेक ऑफ द ईयर के लिए पर्यटन विभाग से शासन को फाइल भेजी गई थी लेकिन वो काम आज भी फाइल में ही दबा हुआ है। इसके बावजूद भी यहाँ काफी लोग आते हैं। चेनाप घाटी को देश-दुनिया भले ही ना जानती हो लेकिन पश्चिम बंगाल के लोगों का पसंदीदा टैक है। आसपास के शिखरों और बुग्यालों को देखने के बाद हम एक बार फिर से सफर पर निकल पड़े, खूबसूरत यादों को सहेजकर।

कब और कैसे जाएँ?

वैसे तो चेनाप घाटी की सुंदरता बारह महीनों रहती है। लेकिन जुलाई से सितंबर के बीच आना सबसे बेस्ट रहता है क्योंकि उस समय ये घाटी फूलों से गुलज़ार रहती है। चेनाप घाटी आने के लिए दो रास्ते हैं। इनमें सबसे सही यही रहता है कि एक रास्ते से आएँ और दूसरे से जाएँ। पहला रास्ता थैंग गांव के घिवाणी तोक और दूसरा रास्ता मेलारी टाॅप से होकर जाता है। मेलाॅरी टाॅप से हिमालय की दर्जनों पर्वत श्रंखलाओं को नज़ारा देखते ही बनता है। इसके अलावा बद्रीनाथ हाइवे पर बेनाकुली से खीरों और माकपाटा होते हुए चेनाप घाटी पहुँचा जा सकता है। ये 40 कि.मी. लंबा ट्रेक है। साल 2013 में जब फूलों की घाटी जाने वाला रास्ता ध्वस्त हो गया था तो लोग यहाँ आने लगे। तब से ही लोग इस घाटी के बारे में थोड़ा-बहुत जानते हैं।



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Friday, 24 July 2020

हिमाचल प्रदेश: तीर्थन नदी किनारे बने इस सुंदर कॉटेज में बिते सुकून के पल! किसी जन्नत से कम नहीं!

हिमाचल प्रदेश: तीर्थन नदी किनारे बने इस सुंदर कॉटेज में बिते सुकून के पल! किसी जन्नत से कम नहीं! 

किसी यात्रा पर निकलें तो जितना महत्व उस स्थान का होता है, मेरे हिसाब से रहने की जगह भी उतनी ही अहम होती है। इन बातों से आप मेरे बारे कोई राय बनाएँ उससे पहले ही मैं साफ कर देता हूँ कि मैं कोई आराम पसंद ट्रैवलर नहीं हूँ। मैं कभी भी अपने रहने की जगह को आराम और सुविधाएँ देखकर नहीं चुनता बल्कि उसके आसपास के माहौल को भी परखता हूँ। एक ट्रैवलर के लिए होटेल या हॉस्टल की सुविधा के साथ ही उसकी लोकेशन और नज़ारा भी मायने रखता है। जब तक उस अकल्पनीय नज़ारे को सामने नहीं पाता हूँ तब तक जी को सुकून नहीं मिलता है।

आप भी अगर कुछ ऐसा ही सोचते हैं तो ये जगह परफेक्ट है, जिसे मैंने तीर्थन घाटी में सुकून के पल बिताने के लिए चुना था।

खास इनके लिए है ये जगह!
कपल, छोटे परिवार जो प्रकृति के करीब समय बिताना चाहते हैं, जिन्हें बिल्लियों और कुत्तों से डर नहीं लगता है, और अपने कमरों तक पहुँचने के लिए थोड़ी चढ़ाई भी कर सकते हैं।

जगह के बारे में जानकारी
राजू भारती के गेस्ट हाउस- के बारे में बताने वाले मेरेे फ्रेंड ने ये भी कह दिया था कि ये ज्यादातर बुक्ड ही रहता है। वहीं, गेस्ट हाउस मालिक राजू के बेटे करन ने भी फोन पर इस बात की पुष्टि कर दी। हालांकि मैंने दिल्ली में अपनेे घर से तीर्थन घाटी देखने की प्लानिंग कर डाली थी। सौभाग्य से जुलाई की शुरुआत में एक कमरा दो दिनों के लिए खाली मिला। लिहाज़ा मैंने मौका हाथ से जाने नहीं दिया और बारिश के दौरान भी लॉन्ग वीकेंड पर छुट्टी मनाने निकल पड़ा!

दो हफ्ते बाद- अपनी कार से गेस्ट हाउस के पास पहुँचा जो कि छोटे शहर गुशैनी से दो मिनट की दूरी पर था। करीब पहुँचकर घने पेड़ों के बीच ओझल गेस्ट हाउस देखा जा सकता था। मुझे पता चल गया कि ये यात्रा किसी एडवेंचर से कम नहीं होने वाली।
गेस्ट हाउस तीर्थन नदी के ठीक सामने है, और जिस रास्ते से आप जाते हैं वो एक चरखी पुल है। यह महज 10 सेकंड के लिए ही पड़ता है जिसे आप आने-जाने के लिए बार-बार इस्तेमाल करते हैं। मैंने कई बार इस चरखी के पुल को पार किया और जो नज़ारा दिखा वो बेहद दिलचस्प था। कॉटेज सेब, चेरी, खुबानी, बादाम और बेर के पेड़ों से भरे एक बाग से घिरा हुआ था। बता दें कि बाग में ज्यादातर पेड़ फलों से लदे हुए थे!
राजू के छोटे बेटे वरुण की भी तारीफ करनी पड़ेगी। उसने मुझे चमचमाते लाल रोडोडेंड्रोन का जूस दिया। गेस्ट हाउस हर तरह की हरियाली से घिरा हुआ था। कॉटेज के लकड़ी से बनी दीवारों पर लताएँ अपना रास्ता बना रही थीं। चारों ओर बगीचे में हर रंग और किस्म के फूल थे। मैं जूस पीते हुए घाटी के बीच में इस छोटे से स्वर्ग को निहारता रहा। इसी बीच एक काले रंग का कुत्ता कहीं से बाहर आया और अपनी ठुड्डी को मेरी गोद में रख दिया। अलग-अलग नस्लों के तीन अन्य कुत्ते भी देखने को मिले। चार कुत्तों के अलावा गेस्टहाउस में चार आकर्षक बिल्लियाँ भी मौजूद थीं। फलों, पेड़ों, बिल्लियों और कुत्तों के साथ हमने सहज और खुशनुमा पल बिताया।

गेस्ट हाउस के कमरे
कमरों की बात करें तो कॉटेज में आठ बड़े-बड़े कमरे हैं। चार मेन कॉटेज में स्थित हैं, जबकि चार एक दूसरी कॉटेज में हैं, जो कि मेन कॉटेज से दो मिनट की पैदल दूरी पर स्थित है। मेरा कमरा इस झोपड़ी में था, और मेरे लिए डबल बेड था। हमारे रहने की जगह से तीर्थन नदी और मेन कॉटेज दिखता था। हमने बाहर खुली बालकनी का इस्तेमाल धूम्रपान करने, पढ़ने और मेरे ताज़ी हवा को महसूस करने के लिए किया।

गेस्ट हाउस में खाना-पीना-
मैंने राजू के खाने के बारे में बहुत सुना था और मुझे यह पसंद आया, मैंने वास्तव में इसे एन्जॉय किया। शायद इसलिए कि इंडियन खाना मेरा पसंदीदा व्यंजन है और राजू के यहाँ इंडियन ही परोसा जाता है। लेकिन इतना कह सकता हूँ कि खाने में आपको बहुत सी विराईटी मिलेगी।

नाश्ते में परांठे, अंडे, टोस्ट, घर का बना जाम, ताजा खुबानी, सेब या रोडोडेंड्रोन का जूस और चाय या कॉफी भी एक विकल्प के रूप में था।

दोपहर का भोजन सब्जियों से भरपूर था जिनमें पनीर, चिकन या मटन, सलाद, अचार, पापड़, चावल और रोटी थी।

शाम को ताज़गी से भरी चाय और कॉफी लेकर हम पेड़ों से फल तोड़ने और उसे खाने के लिए भी घूमते रहे।

डिनर में दोपहर के भोजन की तरह ही कई आइटम के अलावा तली हुई ट्राउट मछली और मिठाई उपलब्ध थी। हमने वहाँ बिताए दो रातों में मीठी सेवइयाँ और फ्रूट कस्टर्ड लिया।

रहने का खर्च

गेस्टहाउस में समय बिताने का शुल्क ₹1500 से लेकर ₹1700 प्रति व्यक्ति है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप शाकाहारी या मांसाहारी भोजन का विकल्प चुनते हैं। इसमें रहना, नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का खाना शामिल है।

ऐसे करें बुक

गेस्टहाउस ऑनलाइन मौजूद नहीं है, इसलिए बुक करने के लिए आपको उन्हें कॉल करना होगा।

 नंबर ये रहे:- 9459833124, 9625211848


जाने का बेहतरीन समय

मौसम के लिहाज़ से तीर्थन घाटी घूमने के लिए अप्रैल से अक्टूबर का समय चुनना चाहिए। जून से लेकर मध्य अगस्त तक मॉनसून के महीनों में घाटी की यात्रा से बचना चाहिए, क्योंकि यहाँ भूस्खलन और बाढ़ की समस्या आम है।


गेस्टहाउस के आसपास क्या कुछ है ख़ास!

गुशैनी और आसपास के इलाके में बहुत कुछ एक्सप्लोर किया जा सकता है। नीचे उनकी लिस्ट देख सकते हैं:


सफर और ट्रेक-


Chhoie Waterfall - तीर्थन घाटी
तीर्थन नदी के साथ-साथ एक सड़क चलती है जो आपको गुशैनी से लगभग 3 कि.मी. दूर स्थित गहिधर गाँव तक ले जाती है। इस रास्ते से आगे बढ़ते हुए गाँव से गुरजते हैं तो 45 मिनट बाद आप एक जादुई वॉटरफॉल देखकर ठिठक जाते हैं। जंगल में छिपे इस 120 फीट ऊँची छोई फॉल के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं, इसलिए आप वहाँ शांति से नज़ारे का आनंद ले सकते हैं। अपने स्विमिंग गियर को साथ ले जाना ना भूलें, ताकि आप साफ पानी में डुबकी लगा सकें।

ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क
यदि आप लंबी पैदल यात्रा के लिए मूड में हैं, तो ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के गेट तक 8 कि.मी. की पैदल दूरी पर लुभावनी खूबसूरती है। ये रास्ता जंगल के बाहरी इलाके से होकर जाता है जो कि ऊँचे पेड़ों, हरी पत्तियों और रंग-बिरंगे तितलियों से भरा रहता है। जैसे ही आप गेट की तरफ बढ़ते हैं, आपको रास्ते में दो गाँवों में रहने वाले स्थानीय लोगों के मुस्कुराते हुए चेहरे का अभिवादन देखने को मिलेगा। इस रास्ते में सबसे अच्छा स्थान झरना ही है, जो गेट से सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर है।

माउंटेन बाइकिंग
अपने दिल के रोमांच और पैरों को काम पर लगाएँ, क्योंकि आप बाइक पर तीर्थन घाटी एक्सप्लोर कर सकते हैं। आपकी रुचि और फिटनेस स्तर के आधार पर, आप आधे दिन या पूरे दिन घूमने निकल सकते हैं। गेस्ट हाउस से किराए पर बाइक ले सकते हैं जिसका शुल्क ₹300 से शुरू होता है। वहीं और ₹300 में आप एक गाइड को साथ ले सकते हैं।

मछली पकड़ना
यदि आप मार्च और अक्टूबर के बीच तीर्थन घाटी में हैं, तो मछली पकड़ने के काम को ज़रूर आजमाएँ। तीर्थन नदी ट्राउट मछली से भरी है, और यदि आप एक या दो मछली पकड़ने में सफल हो जाते हैं तो रात के खाने का इंतजाम हो जाता है। राजू ने ₹800 किराए पर मछली पकड़ने के लिए एक पोल लगाया है, जिसमें एक मछली पकड़ने का लाइसेंस और कुछ बेसिक जानकारी भी शामिल है।

कैसे पहुँचें

कार द्वारा:- दिल्ली इस गेस्टहाउस का सबसे निकटतम मेट्रो शहर है जो कि लगभग 502 कि.मी. दूर है।

बस द्वारा:- हिमाचल रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (HRTC) या निजी बस से ऑट तक पहुँचें। वहाँ से आप या तो लगभग ₹1,000 में गेस्टहाउस के लिए डायरेक्ट टैक्सी ले सकते हैं, या लोकल बस से ₹35 में बंजार तक, और फिर ₹15 में गुशैनी तक एक और बस ले सकते हैं। दिल्ली से पूरी यात्रा में लगभग 14 से 15 घंटे का समय लगता है।

फ्लाइट द्वारा:- दिल्ली से भुंतर हवाई अड्डे तक उड़ान भरें। वहाँ से गुशैनी के लिए एक टैक्सी लें।



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